सिंधु घाटी सभ्यता

आज से लगभग 75 वर्ष पूर्व से सभ्यता लेश मात्र भी ज्ञान नहीं था, किंतु सन 1922 ईस्वी में ब्रिटिश अधिकारी संत जॉन मार्शल की संरक्षित में वर्तमान पाकिस्तान स्थित हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो नामक स्थान का उत्खनन कार्य श्री राखल दास बनर्जी और श्री दयाराम साहनी द्वारा किया गया । इसके परिणाम स्वरूप एक अत्यंत प्राचीन सभ्यता प्रकाश माई बाद में अन्य उत्खनन कार्यों द्वारा ज्ञात हुआ कि इस सभ्यता का विस्तार उत्तर में जम्मू कश्मीर के अखनूर से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी के मुहाने तक और पश्चिम में ब्लू चिप स्थान से लेकर उत्तर पूर्व में मेरठ जिले तक था ।

सिंधु घाटी की सभ्यता

सिंधु घाटी की सभ्यता

प्रारंभ में इस सभ्यता के मुख्य स्थान सिंधु व उसकी सहायक नदियों के समीप क्षेत्र में स्थित थे। इसलिए डॉक्टर व्हीलर आदि विद्वानों ने इसे सिंधु घाटी की सभ्यता का नाम दिया । वर्तमान में सिंधु घाटी सभ्यता को ही हड़प्पा सभ्यता के नाम से जाना जाता है ।

सिंधु घाटी सभ्यता कितने वर्ष पुरानी है?

सिंधु घाटी सभ्यता कितने वर्ष पुरानी है इस बारे में अलग-अलग विद्वानों की अलग-अलग राय है नीचे यहां पर हमने उनके अनुसार दिए गए कालखंड को बताया गया है ।

  • सर जॉन मार्शल के अनुसार 4000 ईसा पूर्व से 2500 वर्ष पूर्व
  • डॉक्टर व्हीलर मतानुसार 2800 ईसा पूर्व से 1500 वर्ष पूर्व
  • डॉक्टर वी ए स्मिथ मतानुसार 2500 ईसा पूर्व से 1500 वर्ष पूर्व
  • फ्रैंकफर्ट के मतानुसार 3200 ईसा पूर्व से 2750 वर्ष पूर्व
  • डॉक्टर आरके मुखर्जी के मतानुसार 3250 ईसा पूर्व से 2750 वर्ष पूर्व

सिंधु घाटी सभ्यता के निर्माता कौन थे?

सिंधु घाटी सभ्यता के निर्माता कौन थे इस विषय में विद्वानों के अलग-अलग मत है

  • डॉक्टर गुहा के अनुसार इस सभ्यता के निर्माता मंगोल और अल्पाइन अर्थात मिश्रित जाति के लोग थे.
  • रंगराज राव के अनुसार इस सभ्यता के निर्माता बहुजातीय थे. इनमें आर्यों का भी एक समूह था जो इस प्रदेश में आकर बस गया था तथा यहां के लोगों से घुलमिल गया था.

हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख स्थलों का वर्णन करो?

हड़प्पा– यह पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के मोंटगोमरी जिले की में रावी नदी के तट पर स्थित प्रमुख नगर था इसके बारे में जानकारी सन 1921 में प्राप्त हुई थी. हड़प्पा के उत्खनन कर्ता दयाराम साहनी

मोहनजोदड़ो– मोहनजोदड़ो की उत्खनन कर्ता रखलदास बनर्जी है. मोहनजोदड़ो नामक स्थान सिंधु नदी के तट पर स्थित है तथा इसकी खोज 1922 ईस्वी में की गई. यह भी पाकिस्तान के सिंध प्रांत के लरकाना जिले में सिंधु नदी के किनारे स्थित प्रमुख नगर था

रोपड़– राजस्थान पंजाब प्रांत के रोपड़ जिले में सतलुज नदी के किनारे स्थित है । यहां पर हड़प्पा कालीन और हड़प्पा से पूर्व की संस्कृतियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं.

लोथल– राजस्थान गुजरात राज्य के अहमदाबाद जिले में भोगवा नदी के किनारे स्थित है. यहां की सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि हड़प्पा कालीन बंदरगाह की खोज है यहां से प्राप्त अवशेषों से ज्ञात होता है कि यहां के निवासी अट्ठारह सौ ईसवी पूर्व भी चावल उगाते थे

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कालीबंगा– यह स्थान वर्तमान राजस्थान राज्य में स्थित है यहां पर हड़प्पा पूर्व संस्कृतियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं

आलमगीर– यह नगर उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में हिडन नदी के तट पर स्थित हड़प्पा संस्कृति की सुविख्यात पूर्वी सीमा थी

बनवाली– यह हरियाणा राज्य के हिसार जिले में स्थित है। यहां पर दो सांस्कृतिक अवस्थाएं हड़प्पा पूर्व और हड़प्पा कालीन देखी गई है। यहां पर उन्नत किस्म का जो प्राप्त हुआ है

रंगपुर- यह गुजरात राज्य के काठियावाड़ प्रदीप में स्थित है . यहां पर उत्तर बड़प्पा अवस्था के प्रमाण प्राप्त हुए हैं

कोट दीजी– यह स्थल भी पाकिस्तान के सिंध प्रांत में स्थित है

चन्हूदरो– यह पाकिस्तान में स्थित सिंध प्रांत में मोहनजोदड़ो से 30 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है. यहां पर मोहरे गुड़ियों के निर्माण के साथ-साथ हड्डियों से निर्मित विभिन्न वस्तुओं का निर्माण भी किया जाता है.

सिंधु घाटी सभ्यता की विशेषताएं

नगर नियोजन– सिंधु सभ्यता को नगरीय सभ्यता कहा जाता है। क्योंकि यहां से नगरों का निर्माण सुनियोजित ढंग से किया गया था। सड़कें लंबी चौड़ी तथा एक दूसरे को समकोण पर काटती थी. नगर आधुनिक व्यवसायिक शैली पर निर्मित थे प्रत्येक गली में कुआं तथा भवनों में स्नानागार थे. नगर का प्रत्येक भाग लंबाई और चौड़ाई में गलियों द्वारा मोहल्लों में विभाजित किया गया था. सड़कों के किनारे कूड़ा डालने हेतु मिट्टी निर्मित पात्र रखे गए थे. गंदे पानी के निकास के लिए छोटी बड़ी तथा गहरी नालियों का जाल बिछाया हुआ था। ईट, चुना तथा खड़िया मिट्टी से निर्मित इन गलियों को बड़ी-बड़ी दो तथा पत्थरों से ढका जाता था

भवन निर्माण– सड़कों तथा गलियों के दोनों और भवनों का निर्माण एक पंक्ति में कच्ची तथा पक्की ईंटों के द्वारा किया जाता था। भवनों में रसोईघर स्नान घर आंगन तथा शौचालय का निर्माण किया जाता था। भगवान छोटे और बड़े एक मंजिल तथा 2 मंजिल के होते थे। भवनों के द्वार राजमार्गों की ओर ने खुलकर गली में पीछे की ओर खुलते थे. भवन की दीवारों में अलमारियों का निर्माण होता था तथा शंख, हड्डी निर्मित खूंटी को दीवार में लगाया जाता था.

सार्वजनिक स्नानागार– उत्खनन के दौरान मोहनजोदड़ो में सर्वाधिक विशाल सार्वजनिक स्नानागार प्राप्त हुए। पक्की ईंटों से निर्मित इस स्नानगर की लंबाई 39 फिट तथा गहराई 8 फीट और चौड़ाई 23 फीट है. इसके चारों और बरामदे स्नान हेतु चबूतरे तथा अंदर पहुंचने के लिए सीढ़ियां थी। स्नानागार की बाहरी दीवार पर गिरिपुष्प का 1 इंच मोटा प्लास्टर था. नगर के ऊपर निर्मित कमरों में संभवत पुजारी निवास करते थे जो विशेष पर्व पर स्नान हेतु नीचे आते थे.

अन्नागार– मोहनजोदड़ो का अन्नागार 45.71 मीटर लंबा तथा 15.23 मीटर चौड़ा है । हड़प्पा के दुर्ग में 6 और अन्य अन्ना गार मिले हैं.

सिंधु घाटी सभ्यता का सामाजिक जीवन

समाज की संरचना– सिंधु घाटी सभ्यता का समाज विद्वान, योद्धा, व्यवसाय तथा श्रमजीवी इन 4 वर्गों में बटा हुआ था. विद्वानों में पुरोहित वैद्य, ज्योतिषी, योद्धाओं में सैनिक और राजकीय अधिकारी, व्यवसायियों में व्यापारी तथा श्रमजीवी वर्ग मे मेहनत मजदूरी करने वाले लोग आते थे.

भोजन– भोजन शाकाहारी तथा मांसाहारी दोनों प्रकार का किया जाता था अब भोजन में गेहूं, चावल, फल ,सब्जियां ,खजूर ,दही, दही से निर्मित वस्तुएं मछली व भेड़ का मांस प्रचलन में था. उत्खनन के दौरान मिठाई के सांचे तथा सिलबट्टे प्राप्त हुए हैं जिस से ज्ञात होता है कि सिंधु घाटी सभ्यता के लोग मिठाई तथा स्वादिष्ट भोजन के प्रेमी थे

वस्त्र– ऊनी तथा सूती दोनों प्रकार के वस्त्र प्रचलन में थे वस्त्रों में उत्तर की तरह कौशल तथा अधोवस्त्र प्रमुख थे

आभूषण– हार, भुज बंद, कर कंगन, अंगूठी, कर्णफूल, छल्ले, करधनी, नथुनी, बाली, पायजेब आदि विभिन्न धातुओं से निर्मित आभूषणों का प्रयोग स्त्री तथा पुरुष द्वारा किया जाता था. धनी लोगों के आभूषण स्वर्ण, चांदी, कीमती पत्थर, हाथी दांत द्वारा तथा गरीबों के आभूषण तांबे, अस्थि, सीप, तथा पक्की ईट द्वारा निर्मित होते थे

केस श्रंगार तथा सौंदर्य प्रसाधन– स्त्रियां जोड़ा तथा विभिन्न प्रकार के केश विन्यास करती थी. सिर पर सोने, चांदी निर्मित आभूषण पहनती थी. पुरुष दाढ़ी मूछ रखते थे. स्त्रियां लाली, विलेपन, काजल, सूरमा व सिंदूरा दी सौंदर्य प्रसाधन का प्रयोग करती थी.

मनोरंजन के साधन– सिंधु घाटी सभ्यता के लोग शतरंज, संगीत, नृत्य, जुआ आदि से मनोरंजन करते थे. झुनझुन, सिटी, गाड़ी एवं अन्य खिलौने बच्चों के मनोरंजन के साधन थे.

आवागमन के साधन- सिंधु घाटी सभ्यता के लोग आवागमन के लिए बैलगाड़ी तथा एक के गाड़ी आदि का प्रयोग किया करते थे

मृतक संस्कार- सबको जमीन में दफना दिया जाता था कुछ लोग सब को जलाने के पश्चात उसकी राख को किसी पात्र में रखकर जमीन में गाड़ दे देते कुछ लोग मृतक शरीर को खुले में पशु पक्षियों के भक्षण हेतु कुछ दिनों के लिए फेंक देते तथा बाद में शेष बचे अस्थियों को जमीन में गाड़ देते थे

स्त्रियों की दशा-

उत्खनन के दौरान प्राप्त नारी की मूर्तियां इस बात का द्योतक है कि सिंधु घाटी सभ्यता के समय स्त्रियों का स्थान सम्मानीय था तथा समाज स्त्री प्रधान था.

सिंधु घाटी सभ्यता का आर्थिक जीवन

इस भाग में हम सिंधु घाटी सभ्यता के आर्थिक जीवन के बारे में चर्चा करेंगे. सिंधु घाटी सभ्यता के समय लोगों का आर्थिक जीवन किस प्रकार का था विस्तृत चर्चा नीचे करेंगे.

कृषि– गेहूं जो कपास राइटर खजूर अनार आदि की खेती की जाती थी. खेती में लकड़ी के हल तथा कटाई के लिए पत्थरों की दरात का प्रयोग किया जाता था. खेतों में सिंचाई तालाब नदी हुए तथा वर्षा के पानी के माध्यम से की जाती थी.

पशुपालन– कृषि के पश्चात पशुपालन सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों का प्रमुख पैसा था यह लोग बैल, ऊंट, फीस, भेड़ ,बकरी ,सूअर, हाथी, कुत्ते, बिल्ली आदि पालते थे. सुरकोटड़ा से कुछ घोड़ों के अवशेष भी प्राप्त हुए जिससे यह आभास होता है कि संभवत यह लोग घोड़ों को भी पालते होंगे किंतु घोड़ों के विषय में विद्वान एकमत नहीं है.

व्यवसाय– अस्त्र शास्त्र, पात्र, वस्त्र, आभूषण, बढ़ाई तथा शिल्प संबंधी व्यवसाय प्रचलन में थे. सिंधु सभ्यता के विदेशों से व्यापारिक संबंध थे. व्यवसाय स्थल तथा जलमार्ग के द्वारा किया जाता था. उनके मेसोपोटामिया, अफगानिस्तान एवं मद्धेशिया क्षेत्र के साथ व्यापारिक संबंध थे.

नापतोल के साधन– नापतोल के लिए सी पी के टुकड़े तथा बांटो का प्रयोग किया जाता था अधिकांश बाट घनाकार होते थे नाप तोल के इकाई वर्तमान की भांति 16 थी. छोटे बांटो का प्रयोग जौहरी के द्वारा किया जाता था.

हड़प्पा सभ्यता का धार्मिक जीवन

मातृ देवी की उपासना

शिव की उपासना

लिंग तथा योनि की उपासना

वृक्ष तथा पशुओं की उपासना

भारतीय वास्तुकला और मूर्तिकला

मिट्टी के बर्तन

मोहरे

मूर्तियां

लघु मूर्तियां

ताबीज

मनके

 

 

 

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